गुजरात में भाजपा ने 2014 में सभी 26 सीटें जीती थीं। ये कमाल 2019 में भी हो, इस पर भरोसा भाजपा को भी कम ही है। गुजरात सरकार, आईबी और खुद आरएसएस की अंदरुनी रिपोर्ट भी ‘दोबारा 26’ को लेकर संशय में हैं। पर मोदी आज भी गुजरातियों के चहेते नेता हैं। भाजपा के लिए एकमात्र ब्रह्मास्त्र मोदी ही हैं। भाजपा मोदी को लेकर एक बार फिर इमोशनल कार्ड खेलना चाहती है। गुजराती प्रधानमंत्री, मजबूत प्रधानमंत्री और गुजराती गौरव की बातें उठा ही रही है।
भाजपा प्रवक्ता भरत पंड्या भी कहते हैं कि मोदी की वजह से गुजरात का विकास हुआ है। जो मोदी को हटाना चाहते हैं, उन्हें मोदी नहीं, गुजरातियों से नफरत है। मोदी तो कांग्रेस के लिए भी मुद्दा है। कांग्रेस सवाल उठाती है कि मोदी ने गुजरात के लिए क्या किया? सिवाय अपनी मार्केटिंग के। किसान मर रहा है। नौकरियां नहीं हैं। विकास झूठा है।
कांग्रेस पटेलों के गुस्से को फिर भुनाना चाहती है। लेकिन जो पटेल आंदोलन का चेहरा थे, वे अब भाजपा और कांग्रेस के चेहरे बन चुके हैं। आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को आरक्षण देकर भाजपा ने नाराज पटेलों को काफी हद तक मना लिया है। 2014 का चुनाव सिर्फ मोदी का था। तब न मुद्दे देखे गए, न जातियां और न चेहरे। तब हर सीट पर मोदी ही प्रत्याशी थे। अब ऐसा नहीं है। शहरों में भाजपा काफी मजबूत है। पर गांवों में कांग्रेस सांस लेती दिख रही है। शहरी इलाकों में लोकसभा की 8 सीटें हैं। अहमदाबाद की दो सीटें, गांधीनगर, वडोदरा, सूरत, भावनगर, राजकोट और जामनगर। बाकी 18 सीटें ग्रामीण इलाकों में हैं।
सत्ता विरोधी लहर या पाटीदारों के गुस्से के बावजूद 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा जीती तो इसकी वजह भी शहरी इलाकों की सीटें थीं। इसीलिए कांग्रेस भी गांवों पर जोर लगा रही है। सौराष्ट्र को वो सॉफ्ट टारगेट मान रही है। 7 लोकसभा सीटों वाले सौराष्ट्र-कच्छ में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 49 में से 26 सीटें जीती थीं। पटेल और किसानों के सहारे कांग्रेस यहां कमाल की कल्पना कर रही है। अमरेली, पोरबंदर, जूनागढ़में वो सबसे ज्यादा उम्मीदें लगाए हुए है। पूरे गुजरात की बात करें तो ग्रामीण इलाकों वाली 10 से 15 सीटों पर कांग्रेस ज्यादा जोर लगा रही है। उसकी कोशिश 8 से 10 सीटें निकालने की है।
4 जोन में बंटे गुजरात के मूड को ऐसे समझिए
सौराष्ट्र-कच्छ : 7 सीटों वाले इस जोन में 5 पर भाजपा, 2 पर कांग्रेस मजबूत
सीटें : राजकोट, भावनगर, कच्छ, पोरबंदर, जूनागढ़, अमरेली, जामनगर
2014 में सौराष्ट्र भाजपा का था, विधानसभा में कांग्रेस की तरफ चला गया। वजह थी किसान और पाटीदार आंदोलन। अब जाति सबसे बड़ा फैक्टर है। पाटीदार, कोली, अहीर कई सीटों पर निर्णायक हैं। राजकोट सीट पर भाजपा मजबूत नजर आ रही है। पर अमरेली और जूनागढ़ में फंसी है। जूनागढ़ में भाजपा के राजेश चुडास्मा को लेकर नाराजगी है। जामनगर, भावनगर, कच्छ में भाजपा सुरक्षित महसूस कर रही है। पोरबंदर में दोनों तरफ उठापटक है।
उत्तर : सौराष्ट्र के बाद सबसे चौंकाने वाले परिणाम उत्तर गुजरात से ही होंगे
सीटें : मेहसाणा, साबरकांठा, बनासकांठा, पाटण, गांधीनगर
मेहसाणा में भाजपा की जड़ें गहरी हैं। मेहसाणा में ही मोदी का गांव वडनगर है। पाटीदार आंदोलन का एपिक सेंटर होने के बावजूद भाजपा की सीट सेफ है। चुनौती है पाटण में। भाजपा ने अंजान चेहरे भरत डाबी को टिकट दिया है। जबकि कांग्रेस से जगदीश ठाकोर जाना नाम है। पहली बार कांग्रेस एकजुट दिख रही है। साबरकांठा में भाजपा फंसी है। बनासकांठा में भाजपा को अपनों से ही खतरा ज्यादा है। भाजपा-कांग्रेस ने ठाकोर प्रत्याशी उतारे हैं।
दक्षिण : बारडोली में कांग्रेस सेफ, बाकी 4 में भाजपा को सिर्फ मार्जिन की चिंता
सीटें : सूरत, बारडोली, नवसारी, वलसाड़ और दमन-दीव
भाजपा ने सूरत में दर्शना जरदोश को दोबारा टिकट दिया है। इस बार यहां मुकाबला मूल सूरती बनाम सौराष्ट्रीय सूरती का है। भाजपा को चिंता हार नहीं, सिर्फ मार्जिन की है। बारडोली में कांग्रेस चुनौती देती दिख रही है। 2.25 लाख पाटीदार वोटरों को जो रिझा लेगा, सीट उसकी हो जाएगी। नवसारी में भाजपा सेफ है। वलसाड़ सीट पर 80 प्रतिशत मतदाता एसटी/एससी हैं। आदिवासी वोट भाजपा-कांग्रेस के बीच लगभग समान हिस्से में बंटे हुए हैं।
मध्य : 9 में से 8 सीट पर भाजपा मजबूत, आणंद में कांग्रेस को उम्मीद
सीटें : अहमदाबाद पूर्व, पश्चिम, वडोदरा, आणंद, खेड़ा, पंचमहाल, दाहोद, भरुच, सुरेंद्रनगर
अहमदाबाद की दोनों लोकसभा सीटों पर भाजपा को कोई समस्या नहीं है। 2014 में मोदी को रिकॉर्ड वोट से जिताने वाले वडोदरा में कांग्रेस भी उम्मीद नहीं कर रही। आणंद सीट जरूर इस बार चौंका सकती है। कांग्रेस ने भारत सिंह सोलंकी को उतारा है। भाजपा ने मितेश पटेल को टिकट दिया है। पंचमहाल, सुरेंद्रनगर में भाजपा को अंदरूनी लड़ाई का डर है। भरुच में लड़ाई त्रिकोणीय होने का फायदा भाजपा को मिलेगा।
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